"लॉकडाउन और रचनात्मकता" मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में घुलना-मिलना,लोक-व्यवहार करना उसकी आदतों में है।कोरोना के संकट में इन सभी क्रियाकलापों में विराम सा लग गया है। कुछ यही वजहें हैं कि लोंगो में अवसाद,मानसिक तनाव और धैर्य क्षीण हो रहा है।लॉकडाउन को इस अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए कि हम अपने घर-परिवार,सामाजिक सरोकार,बंधु-बांधवो से दूर हो जाएं,बल्कि हमें इसमें निरंतरता के साथ रम जाने की कला को सीखना चाहिए ; क्योंकि बिना इसके व्यक्ति जीवन को गतिशीलता प्रदान नहीं कर सकता है। एकांत हर एक व्यक्ति के अंदर होता है। मनुष्य अकेला ही धरती पर जन्म लेता है और अकेला ही इस धरती से जाता है। जीवन में उसे कई ऐसी स्थितियों से गुजरना होता है जिसमें एकांत होता है। इस लॉकडाउन को एकांत के रूप में यदि अपनाया जाए तो यह एक एंटीबायोटिक की तरह कार्य करेगा। यह अवसर खुद से बातें करने का है। जिस आधुनिकता की भागदौड़ में लोग अपनी चेतना को भूल चुके हैं,उसे पुनः जागृत करने का इससे बढिया अवसर कुछ नहीं हो सकता है। यह अपने अंदर की रचनात्मकता से स्वयं को भेंट करवाने का समय है।यह लॉकडाउन आपके जीवन क...