Creativity in lockdown
"लॉकडाउन और रचनात्मकता"
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में घुलना-मिलना,लोक-व्यवहार करना उसकी आदतों में है।कोरोना के संकट में इन सभी क्रियाकलापों में विराम सा लग गया है। कुछ यही वजहें हैं कि लोंगो में अवसाद,मानसिक तनाव और धैर्य क्षीण हो रहा है।लॉकडाउन को इस अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए कि हम अपने घर-परिवार,सामाजिक सरोकार,बंधु-बांधवो से दूर हो जाएं,बल्कि हमें इसमें निरंतरता के साथ रम जाने की कला को सीखना चाहिए ; क्योंकि बिना इसके व्यक्ति जीवन को गतिशीलता प्रदान नहीं कर सकता है।
एकांत हर एक व्यक्ति के अंदर होता है। मनुष्य अकेला ही धरती पर जन्म लेता है और अकेला ही इस धरती से जाता है। जीवन में उसे कई ऐसी स्थितियों से गुजरना होता है जिसमें एकांत होता है। इस लॉकडाउन को एकांत के रूप में यदि अपनाया जाए तो यह एक एंटीबायोटिक की तरह कार्य करेगा। यह अवसर खुद से बातें करने का है। जिस आधुनिकता की भागदौड़ में लोग अपनी चेतना को भूल चुके हैं,उसे पुनः जागृत करने का इससे बढिया अवसर कुछ नहीं हो सकता है।
यह अपने अंदर की रचनात्मकता से स्वयं को भेंट करवाने का समय है।यह लॉकडाउन आपके जीवन की राह में एक गति अवरोधक की तरह है।आपने अभी तक के समय में जो भी गतिशीलता बनाए रखी वह 'ठीक थी या नहीं' यह जाँचने का समय है।और इसी के साथ आगे का ब्लू प्रिंट तैयार करके पुनः एक निरंतरता के साथ कार्यों को करने का संकल्प लेने का समय है। यदि इस समय आप आत्मावलोकन करेंगे तो बहुत सी गुत्थियां सुलझ जाएंगी। शायद यह एकांत होना आपके उन प्रश्नों के उत्तर दे जाए जिसे आप खोजने का प्रयत्न कर रहें हों।
किसी भी व्यक्ति को उसके अंतर्मन का एकांत रचनात्मकता की ओर ले जाता है।व्यक्ति का रचनात्मक विकास दो तरह से हो सकता है। एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। लेकिन रचनात्मक होने की सबसे पहली कसौटी एकांत होना है,इसमें व्यक्ति का स्थिर-एकाग्र होना आवश्यक होता है। इससे घबराने की जरूरत
नहीं ,बल्कि इसे जीवन के एक हिस्से के तौर पर स्वीकार करना चाहिए।
यह स्वाभाविक है कि इस समय लोग मानसिक तनाव जैसी समस्याओं से जूझ रहें होंगे और इसका कारण लोंगो का अकेलेपन के एहसास के साथ जीना है। निश्चित रूप से जब आप किसी विचार को लेकर चिंतन कर रहे होते हैं और हमारे मन में कोई विचार उठता है, तो उसे समझने के लिए हमें स्वयं ही प्रयासरत होना पड़ता है।मन दोनों पहलुओं पर सोचता है। यदि हम नकारात्मक भावों की ओर इस अवस्था में चिंतन करने लगे तो मन दूसरी दिशा की ओर भ्रमित होने लगता है और व्यक्तित्व मनोरोगी,तनावपूर्ण हो जाता है ।
इसके विपरीत यदि सकारात्मक दिशा की ओर झांकने का प्रयास करें तो व्यक्तित्व में निखार आने लगता है,और विकसित होता है।
रचनात्मकता का दायित्व बोध व्यक्ति की सामाजिकता की धुरी है। सामाजिक स्वीकृति तो बड़ी बात है लेकिन उस रचनात्मकता की समाज में उपस्थिति ही रचनाकार की तुष्टि के प्रबल कारण जुटाती है।अपनी कल्पनाशक्ति के उद्दम से रचनात्मकता की भूमि को उर्वर करने के लिए संवेदनशीलता का होना बहुत जरूरी है। यदि लेखक की बात करें तो संवेदनशीलता एक उत्प्रेरक की तरह लेखक की एक मानसिक अवस्था को दूसरी अवस्था में ले जाने का कार्य करती है। ऐसा नहीं है कि कोरोना जैसी बीमारी व त्रासदी से हम गुजरे नहीं हैं। इतिहास में 1918 में ऐसी ही एक त्रासदी 'प्लेग' के नाम से आई थी जिसमें 5 करोड़ से ज्यादा लोंगो की मृत्यु हो गई थी। आज यह कोरोना का संकट इतना भयावह तो नहीं है किन्तु इसकी व्यापकता अधिक है। सुप्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार अल्बैर कामू जो खुद प्लेग (तपेदिक) से 37 की उम्र में प्रभावित हुए थे, उन्होंने अपने जीवन अनुभव पर प्लेग नाम से एक उपन्यास लिखा। इस उपन्यास में दिया गया विवरण कोरोना कालखंड की यादों को ताजा करता है।
जिन क्षणों में सामान्य व्यक्ति घबराएं और चिंतातुर हो, उन क्षणों में रचनात्मक व्यक्ति उस समय को अवसर बनाकर उन क्षणों को सृजन की अनुभूति में बदल देने का कार्य करता है। लौकिक जगत में किए गए वैज्ञानिक आविष्कार हों अथवा अलौकिक जगत में संपन्न की गईं प्रार्थनाएं,ये सभी एकांत के दुर्लभ क्षणों में ही संभव हैं। यदि एकांत के क्षणों का सम्यक उपयोग किया जा सके तो उन्हें जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण क्षणों में परिवर्तित किया जा सकता है।और इसके लिए आपको कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है।
बीसवीं शताब्दी के उपन्यासकार फ्रेंज एकांत के विषय में कहते हैं - "तुम्हें अपना कमरा छोड़कर कहीं जाने की ज़रुरत नहीं है. अपनी टेबल पर बैठकर ध्यान से सुनते रहो. तुम्हें सुनने की ज़रुरत भी नहीं है – बस इंतजार कर शांत और अचल रहने का प्रयास करो. यह दुनिया खुद-बखुद तुम्हारे सामने स्वयं को उजागर करेगी. इसके सामने और कोई विकल्प नहीं है।"
फ्रेंज का यह कथन आज दिनचर्या में लाने की जरूरत है।इस कथन की अनुभूति ने पहले ही कई वैज्ञानिकों, कवियों,लेखकों की समस्याओं को एकांत के द्वारा सुलझाया है। अपने रचनात्मक जीवन की शुरूआत करने का सही समय यही है। एकांत और रचनात्मकता के बीच एक लकीर खींचने का काम कोरोना महामारी ने किया है।इसके प्रभाव आज के लेख और विज्ञापन पर भरपूर दिखाई दे रहा है। कोरोना प्रभाव की वजह से ही प्रवासी मजदूर,स्वास्थ्य कर्मचारी,प्रशासन रचनाकार के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं।
प्रतीक कुमार तिवारी
छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय
हिनौता(सतना,मध्यप्रदेश)
संपर्क सूत्र :- 8770848184
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